अब बढते हैं आगे कि आखिर ऐसा क्या हुआ जो हम दंग रह गये. मीडिया क्या है ? उसका क्या काम है ?क्या तौर तरीके हैं ? इन सबके बारे मे यु तो कालेज मे ही काफ़ी पता चल गया था. इसलिये इस बात कि तो हमने कोइ उम्मीद ही नही कि थी कि जते ही हमे हमारी पसंद की चीज दे दी जायेगी. बस यही था कि जो भी मिलेगा उसे जीजान से करेगें. और सथ मे आस्पास के माहौल को देखेगे जानेगे.सो हम्ने वही किया.रनडाउन दिया गया हफ़्ते भर मे सीख लिया.अब क्या नयी मशीन आयी थी वास्प 3D . अब भाई इंटर्न होने के नाते हमे ही सीखनी थी सो हमने सीख ली.हा ये और बात है कि हमारी कंप्युटर मे जो रुचि बचपन से थी उसने हमारी मदद की. और पिछ्ले कै सालो से घर मे इस य़ंत्र की जीभर कर जो चीड फ़ाड की थी उसके चलते इसकी रग रग से वकिफ़ थे.
कुल मिलाकर हमने सीख लिया. और बस लग गये काम मे नया काम था मन लगाकर लिया.और करते गये.फ़िर एक दिन ध्यान आया कि यार कर क्या रहे हैं ऐसे तो कोइ पूछ ही नहे रहा है कि और भी कुछ करना है कि नही. आखिर कब तक खबरे ब्रेक करते रहेगे. इस दौरान बाकी लोगो से मिलने का मौका मिला उनका काम देखने को मिला.और फ़िर लगा कि यार अगर हमे मौका मिला तो इनसे तो बेहतर ही करेगे.किसी की बुराइ नही कर रहा लेकिन हा कभी कभी अफ़सोस भी हुआ कुछ लोगो को देख्कर जिन्हे हिंदी भी ढंग से नही आती वे लोग भी हमसे बेहतर काम कर रहे थे. और यह सब देख्कर हम पहले तो इस उम्मीद मे थे कि आज नही कल हमे भी अपना हुनर दिखाने का मौका मिलेगा.पर नही २ महीने बाद पता चला आप्को इसी सीट पर फ़िक्स किया जा रहा है क्योकि आप काम ठीक कर रहे हैं.
ये लो .. अब इसका क्या मतलब हुआ.हम काम कर रहे हैं क्योकि हमे दिया गया वो हमारी जिम्मेदारी थी .हमने पूरी की.लेकिन ये क्या कि जो हम चाहते है उसके बारे मे एक बार पूछा भी नही गया.आप १० घंते काम कराते हो ठीक है पर इसका मतलब ये नही की आप जो चाहो सिर्फ़ वही हम करे.फ़िर पिछ्ले तीन साल से जो झक मार रहे थे उसका क्या? जो इतना स्पेस्लाइजेशन किया वो तो गया बिन में. हद तो तब हो गयी जब अपने ही हेड से अपनी बात कहने गये तो जवाब मिला . इस तरह बात नहे करते कि मेरा काम बदल दो अन्यथा मै आप्का संस्थान छोड्ना चाहुगा.भाई हम तो सीरियस थे . और जो दिल मे था बडे ही स्पष्ट शब्दो मे आप से कह दिया.आप भी एक शब्द मे कह देते हा या ना. पर आप कुर्सी पर है इस्लिये होथो पर उगली रख्कर कह सकते है कि १ हफ़्ते बाद आना तब बात करेगे.
आखिर क्यु ? एक तो पिछ्ले २ महीने से जो भी काम दिया गया हमने उसे अच्छे से किया. आप्को कभी भी उगले उठाने का मौका नही दिया. और आज जब आपसे कुछ कहना चाहा तो एक हफ़्ते बाद आना. वाह रे मीडिया पुरुष. तुम मुझे उस सीट पर जाब देने को तैयार जो लेकिन मेरा काम नही बदलोगे क्योकि इससे तुम्हारे सम्मान को ठोकर लगती है कि मै तुम्हातरे दिए काम को अस्वीकार कैसे कर सकत हु. और मै जो तुम्हे अश्सावसन देता हू कि मुझे मेरे मन का काम दो मै तुम्हारे बाकी लोगो से बेहतर करके दिखाउगा तो तुम्हे वह स्वीकार नही. क्योकि मीडिया मे 'तुम जाओगे तो हजारो पडे है ' इसलिये सिर्फ़ तुम बोलोगे और हजारो लोग सिर्फ़ सुनेगे.
फ़्रीडम आफ़ एक्स्प्रेशन के नाम पर हमने मीडिया मे कदम रखा था यहा तो हमारी ही एक्स्प्रेशन को ही लकवा मार गया. आप जानते क्या हो अभी हमारे बारे मे इंटर्न ही तो है उन्हे मौका तो दो खुद को साबित करने का. मैने तो खुद को साबित करना चाहा जो आपने दिया मैने किया अब जो मै चाहता हू वो मुझे मिलना चाहिये. सच तो यही कहता है लेकिन यहा तो बात हे निराली है चुकि आप अभी नये हैं इसलिये भले ही कितना अच्छा काम करे आप को काम नही मिलेगा. बात यहे खत्म नही होती. कुछ चीजे और भी है जिन्हे मीडिया मे उतरने से पहले मैने सुना था उन्से भी इस दौरान रूबरू होने का मौका मिला. वो हम बात करेगे अगली बार..continue
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मंगलवार, 4 दिसंबर 2007
मंगलवार, 27 नवंबर 2007
मीडिया और शोषण
बहुत सोचने विचारने के बाद अपनी पसंद नापसंद को परखने के बाद, हमने मीडिया को चुना था. घर वालो का विरोध सहा,उनसे कहने के लिये कुछ नही था कि हमारा भविष्य क्या होगा? अब दिल्ली जैसे शहर मे भले ही पत्रकारिता का रंग चटख हो.लेकिन हमारे यहा कानपुर की तरफ़ पत्रकार की पहचान झोला छाप,बाटा चप्पल धारक और मोटे फ़ेम के चश्मे वाले आदरणीय परंतु निरर्थक पुरुष की ही थी.खैर हमने फ़ैसला किया और आ गये सब टीम टाम लेकर. तीन साल का कोर्स किया और हो गये ग्रेजुएट-इन-जर्नलिज्म .
तीन साल के अनुभव तो बहुत रहे पर पता नही क्यु वहा सभी को इतना रोते बिलखते पाया. अभी जुम्मा चुम्मा ७-८ महीने ही हुये होगे की इंटर्न्शिप का हल्ला कानो को बहरा करने लगा.जिसे देखो भागा जा रहा है.ढूढ रहा ह कि मेरे मामा के भतीजे या भैया के दोस्त कहा काम कर रहे है. कितनी जल्दी उन्हे बता दे की हम भी आ रहे है . हमारा कुछ करिये. हमने ज्यादा ध्यान नही दिया. और पाया कि साल खत्म होते होते जब हम अपने सेलेबस पर चर्चा कर रहे थे कि ये ऐसा होना चहिये वैसा होन चाहिये . कुछ लोग इन सब से दूर अपने लिये जुगाड का इंतजाम कर रहे थे.होना क्या था उन्हे आखिर इंटर्नशिप मिल गयी.
दूसरा सत्र शुरू हुआ तो पाया कि उन चेहरो मे अजीब सी चमक बढ गयी है जिन्होने आखिरकार साल खत्म होते होते अपने जान पहचान मे मीडिया मे 'इंट्री'दिला सकने वाले र्रिश्ते तलाश लिये थे. और उनका प्रयोग भी कर लिया था. ये खबर आग की तरह फ़ैली. कि पता है पिछ्ली छुट्टियो मे उसने वहा काम किया.उसने वहा . उसके भैया तो वे है ये है फ़ला जगह के चीफ़ है. उसका 'जुगाड'तो फ़िट है.अब भई पहली बार हमे पता चला कि करेले को देख्कर करेला भी कैसे रंग बदलता है. मुश्किल से ४० लोग जुट्ते थे पढाई के लिये . अब तो भगदड मच गयी ४० के आधे रह गये उन्मे से भी कई बस इस्लिये क्योकि अभी तक ऎसा कोइ जुगाड वे ढूढ नही पाये थे.एक हमारे जैसे कुछ लोग थे जो यही सोच रहे थे कि यार अभी तो आधा कोर्स भी नही हुआ. सीखा ही कितना है. ईलेकट्रानिक तो अभी छुआ ही नही फ़िर भला किसी से कैसे कह दे कि भाई हमे काम दे दो. अभी तो आधे ग्यान से अंजान है किसीने बोला कि बनाओ इस खबर का एंकर पैकेज तो हम तो बोल जायेगे.
जब उन दोस्तो से कहा तो जवाब मिला कि अरे कोर्स वोर्स काम नही आयेगा ..ये प्रेक्टिकल फ़ील्ड है .किताबो से कुछ नही होगा. उनकी बाते हमे भी सही लगी जब देखा कि कई बार हमारे टीचरगण भी इन वाक्यो कि पुनराव्रत्ति कर रहे है. दिल मे सवाल तो कई उठे मसलन अगर ऐसा ही है तो जो सालो से किताबो की खाक छानकर चीजे एक जगह इकठ्ठी कर हमारे लिये तीन साल का कोर्स डिजाइन करते है वे क्या निरे नासमझ है ? क्या उन्हे नही पता कि ये सब बकवास है.उन्हे तो बस ये पढाना चहिये कि मीडिया मे जुगाड कैसे तलाशे ? इंटरनशिप पाने के अचूक नुस्खे . मखनबाजी मे शार्ट टर्म ट्रेनिग ...इत्यादि. यकीनन इनसे सब का कितना भला होता . और तब मीडिया के कोर्स को बनाने वाले को इतनी गालियां भी ना सुननी पडती.
खैर दूसरा साल गुजरा. हम्ने पाया कि भाई हम ही बचे है जो अभी भी पन्नो और असांइंमेटो मे ही अपनी कलम और मैटेरियल के लिये किताबो ,इंटरनेट मे झक मार रहे है.और खुश है कि सर से A+ मिला . नही मिला तो क्यु नही मिला कहा क्या कमी रह गयी.बात पते कि एक और बता दे जब सभी अपना रिज्युमे अपडेट कर रहे थे. हम बस यही सोच रहे थे कि क्या हम भी इन सब को छोडकर रिज्युम करे या 'रुको मत भागो'वाली कहावत पर चले. कुल मिलाकर हमने भी अपने पैर किताबो और कालेज की चारदीवारी से बाहर निकाल लिये और कूद पडे. चक्कर लगाने शुरू किये नया नया जोश था पहली बार बडे बडे मीडिया हाउस देखने का मौका मिला. बडी मेहनत से रिज्युम तैयार किये. सब लिखा यहा ये जीता वहा ये किया. मौका मिला तो और भी बेहतर करेगे. दफ़्तरो मे गये और रिज्युम दे दिया. वैसे रिज्युम ज्यादातर जगहो मे गेट के बाहर ही रखवा लिये गये. थोडा बुरा तो लगा पर क्या करते बिन जुगाड सब सून कबीरा . जो था जैसा था स्वीकार कर लिया.
काफ़ी अरसा हुआ जवाब ही नही आया कही से .कोइ रिस्पास ही नही. बहुत बुरा लगा.लगा कि सच है यार हम बस अपनी तुरर्म्खानी मे ही उडते रह गये.हुआ कुछ नही. हमारे A+ ग्रेड किसी काम नही आये. एक बार तो मन बहुत खट्टा हुआ लगा कि यार क्या किया अपने ही पैरो मे कुल्हाडी मार ली. और कही होते इतना करते तो लोग बुला बुला के काम देते . यहा तो बस एक मौका भी नही मिल रहा.वो भी जब सब कुछ फ़्री मे ही होना तब ये हाल है.पर कब तक रोना रोते . हकीकत यही थी कि हम थे बिना जुगाड के.और अचानक से जुगाड को पैदा तो कर नही सकते थे.तो मन को ढांढस बंधाया कि और पढेगे और इसी को अपना जुगाड बनायेगे.और फ़िर क्या लग गये दूने जोश के साथ.
पता नही क्या था? हमने ऐसा क्या किया था कि सहारा परिवार को हम पर दया आयी और आखिरकार 'इंटर्न्शिप नामक वर्जित फ़ल' का स्वाद हमे भी चखने को मिला.मजा आया सच मे पहली बार प्रेक्टिकली काम किया जितना आता था सब झोंक दिया. और जब वक्त खत्म होने पर कहा गया तुम काम अच्छा करते हो. और भाषा पर पकड भी अच्छी है बस लगा कि इतनी पढाइ काम आ गयी. आखिर ये सब इसीलिये तो किया था.भाई सीना फ़ूल के चौडा हो गया.आखिरी सेमस्टर आया तो अपना पसंदीदा विषय साहित्य चुना.आर्ट एंड कल्चर के पूरे ६ महीने पढाई की . और सिनेमा को स्पेशल पेपर लिया. प्रोजेक्ट बनाया . और सबको पसंद आया.
तीन साल पूरे हुये . अब पूरी तरह से मैदान मे थे.ये करेगे वो करेगे कितनी अरमान दिलो दिमाग मे थे.लेकिन भाई अब ह्कीकत से सामना हुआ. रिज्युम फ़ोटोकापी करा करा के थक गये लेकिन कही बात नही बनी. जहा भी जाओ या तो एक्स्पीरियंस या फ़िर जुगाड. अब हमने तो कम किया था कम और ज्यादा फ़ोकस किया पढाइ पे. अब एक बार ही तो पढना था.और बचपन से सुनते आ रहे थे कि पढाइ कभी बेकार नहे जाती सो विश्वास था कि एक मौका मिलेगा और बस हम खुद को साबित कर देगे आखिर काम तो हम सीख जायेगे ही, क्योकि आये ही इसलिये है लेकिन जिन्होने सिर्फ़ काम सीखा है उनसे एक कदम तो आगे रहेगे ही.लेकिन जब मौका मिला तो दंग रह गये.....continue...
तीन साल के अनुभव तो बहुत रहे पर पता नही क्यु वहा सभी को इतना रोते बिलखते पाया. अभी जुम्मा चुम्मा ७-८ महीने ही हुये होगे की इंटर्न्शिप का हल्ला कानो को बहरा करने लगा.जिसे देखो भागा जा रहा है.ढूढ रहा ह कि मेरे मामा के भतीजे या भैया के दोस्त कहा काम कर रहे है. कितनी जल्दी उन्हे बता दे की हम भी आ रहे है . हमारा कुछ करिये. हमने ज्यादा ध्यान नही दिया. और पाया कि साल खत्म होते होते जब हम अपने सेलेबस पर चर्चा कर रहे थे कि ये ऐसा होना चहिये वैसा होन चाहिये . कुछ लोग इन सब से दूर अपने लिये जुगाड का इंतजाम कर रहे थे.होना क्या था उन्हे आखिर इंटर्नशिप मिल गयी.
दूसरा सत्र शुरू हुआ तो पाया कि उन चेहरो मे अजीब सी चमक बढ गयी है जिन्होने आखिरकार साल खत्म होते होते अपने जान पहचान मे मीडिया मे 'इंट्री'दिला सकने वाले र्रिश्ते तलाश लिये थे. और उनका प्रयोग भी कर लिया था. ये खबर आग की तरह फ़ैली. कि पता है पिछ्ली छुट्टियो मे उसने वहा काम किया.उसने वहा . उसके भैया तो वे है ये है फ़ला जगह के चीफ़ है. उसका 'जुगाड'तो फ़िट है.अब भई पहली बार हमे पता चला कि करेले को देख्कर करेला भी कैसे रंग बदलता है. मुश्किल से ४० लोग जुट्ते थे पढाई के लिये . अब तो भगदड मच गयी ४० के आधे रह गये उन्मे से भी कई बस इस्लिये क्योकि अभी तक ऎसा कोइ जुगाड वे ढूढ नही पाये थे.एक हमारे जैसे कुछ लोग थे जो यही सोच रहे थे कि यार अभी तो आधा कोर्स भी नही हुआ. सीखा ही कितना है. ईलेकट्रानिक तो अभी छुआ ही नही फ़िर भला किसी से कैसे कह दे कि भाई हमे काम दे दो. अभी तो आधे ग्यान से अंजान है किसीने बोला कि बनाओ इस खबर का एंकर पैकेज तो हम तो बोल जायेगे.
जब उन दोस्तो से कहा तो जवाब मिला कि अरे कोर्स वोर्स काम नही आयेगा ..ये प्रेक्टिकल फ़ील्ड है .किताबो से कुछ नही होगा. उनकी बाते हमे भी सही लगी जब देखा कि कई बार हमारे टीचरगण भी इन वाक्यो कि पुनराव्रत्ति कर रहे है. दिल मे सवाल तो कई उठे मसलन अगर ऐसा ही है तो जो सालो से किताबो की खाक छानकर चीजे एक जगह इकठ्ठी कर हमारे लिये तीन साल का कोर्स डिजाइन करते है वे क्या निरे नासमझ है ? क्या उन्हे नही पता कि ये सब बकवास है.उन्हे तो बस ये पढाना चहिये कि मीडिया मे जुगाड कैसे तलाशे ? इंटरनशिप पाने के अचूक नुस्खे . मखनबाजी मे शार्ट टर्म ट्रेनिग ...इत्यादि. यकीनन इनसे सब का कितना भला होता . और तब मीडिया के कोर्स को बनाने वाले को इतनी गालियां भी ना सुननी पडती.
खैर दूसरा साल गुजरा. हम्ने पाया कि भाई हम ही बचे है जो अभी भी पन्नो और असांइंमेटो मे ही अपनी कलम और मैटेरियल के लिये किताबो ,इंटरनेट मे झक मार रहे है.और खुश है कि सर से A+ मिला . नही मिला तो क्यु नही मिला कहा क्या कमी रह गयी.बात पते कि एक और बता दे जब सभी अपना रिज्युमे अपडेट कर रहे थे. हम बस यही सोच रहे थे कि क्या हम भी इन सब को छोडकर रिज्युम करे या 'रुको मत भागो'वाली कहावत पर चले. कुल मिलाकर हमने भी अपने पैर किताबो और कालेज की चारदीवारी से बाहर निकाल लिये और कूद पडे. चक्कर लगाने शुरू किये नया नया जोश था पहली बार बडे बडे मीडिया हाउस देखने का मौका मिला. बडी मेहनत से रिज्युम तैयार किये. सब लिखा यहा ये जीता वहा ये किया. मौका मिला तो और भी बेहतर करेगे. दफ़्तरो मे गये और रिज्युम दे दिया. वैसे रिज्युम ज्यादातर जगहो मे गेट के बाहर ही रखवा लिये गये. थोडा बुरा तो लगा पर क्या करते बिन जुगाड सब सून कबीरा . जो था जैसा था स्वीकार कर लिया.
काफ़ी अरसा हुआ जवाब ही नही आया कही से .कोइ रिस्पास ही नही. बहुत बुरा लगा.लगा कि सच है यार हम बस अपनी तुरर्म्खानी मे ही उडते रह गये.हुआ कुछ नही. हमारे A+ ग्रेड किसी काम नही आये. एक बार तो मन बहुत खट्टा हुआ लगा कि यार क्या किया अपने ही पैरो मे कुल्हाडी मार ली. और कही होते इतना करते तो लोग बुला बुला के काम देते . यहा तो बस एक मौका भी नही मिल रहा.वो भी जब सब कुछ फ़्री मे ही होना तब ये हाल है.पर कब तक रोना रोते . हकीकत यही थी कि हम थे बिना जुगाड के.और अचानक से जुगाड को पैदा तो कर नही सकते थे.तो मन को ढांढस बंधाया कि और पढेगे और इसी को अपना जुगाड बनायेगे.और फ़िर क्या लग गये दूने जोश के साथ.
पता नही क्या था? हमने ऐसा क्या किया था कि सहारा परिवार को हम पर दया आयी और आखिरकार 'इंटर्न्शिप नामक वर्जित फ़ल' का स्वाद हमे भी चखने को मिला.मजा आया सच मे पहली बार प्रेक्टिकली काम किया जितना आता था सब झोंक दिया. और जब वक्त खत्म होने पर कहा गया तुम काम अच्छा करते हो. और भाषा पर पकड भी अच्छी है बस लगा कि इतनी पढाइ काम आ गयी. आखिर ये सब इसीलिये तो किया था.भाई सीना फ़ूल के चौडा हो गया.आखिरी सेमस्टर आया तो अपना पसंदीदा विषय साहित्य चुना.आर्ट एंड कल्चर के पूरे ६ महीने पढाई की . और सिनेमा को स्पेशल पेपर लिया. प्रोजेक्ट बनाया . और सबको पसंद आया.
तीन साल पूरे हुये . अब पूरी तरह से मैदान मे थे.ये करेगे वो करेगे कितनी अरमान दिलो दिमाग मे थे.लेकिन भाई अब ह्कीकत से सामना हुआ. रिज्युम फ़ोटोकापी करा करा के थक गये लेकिन कही बात नही बनी. जहा भी जाओ या तो एक्स्पीरियंस या फ़िर जुगाड. अब हमने तो कम किया था कम और ज्यादा फ़ोकस किया पढाइ पे. अब एक बार ही तो पढना था.और बचपन से सुनते आ रहे थे कि पढाइ कभी बेकार नहे जाती सो विश्वास था कि एक मौका मिलेगा और बस हम खुद को साबित कर देगे आखिर काम तो हम सीख जायेगे ही, क्योकि आये ही इसलिये है लेकिन जिन्होने सिर्फ़ काम सीखा है उनसे एक कदम तो आगे रहेगे ही.लेकिन जब मौका मिला तो दंग रह गये.....continue...
मंगलवार, 20 नवंबर 2007
विवाह संस्था - क्यो ?
शादी क्यो की जानी चाहिऐ इसका ऐसा कोई सार्वजनिक जवाब नही है जो एक साथ धरा के प्रत्येक मानुष को संतुष्ट कर सके. शदी कि अवधि कितनी होनी चाहिये इसका भी कोइ तय समय निर्धारित करना संभव नही है. इस पंक्ति पर कई लोग आंखे सिकोड़ सकते हैं.पर वो क्या है ना यह प्रश्न मैने इसलिये किया की आज के समय मे भी अगर कोइ इस बात पर यकीन करता है कि यह बंधन तो स्वर्ग मे बनता है और ताउम्र के लिये बानता है.तो मै बस इतना ही कहूगा ऐसा है तो भला यह अटूट दोर एक दश्तखत मात्र से क्यो टूट जाती है.सात जन्मो के लिये बना यह रिश्ता सात महीनो और सात हफ़्तो मे क्यो टूटने लगा है?
शादी सिर्फ़ घर बसाने या पीढियो को आगे बढाने के लिये नही की जाती. नाही परिणय दो जिस्मो के लिये आवश्यक मिलन का संधिस्थल है. बल्की इन सब से कही आगे है.हमारे समाज की सबसे बडी संस्थाओ मे से एक विवाह की स्पस्ट परिभाषा से मै अपरिचित हू.हा जहा तक मैने समझा है वह यह है की पुरुष और स्त्री दोनो के लिये यह संबंध स्व्यं मे विशिष्ट है. इसे प्राक्र्तिक वजह कहे या पुरुष का सदियो से संचित किया हुआ दंभ ,वह किसी भी तरह के बंधन को अस्वीकार करता है.सवच्छंद जीवन जीने की कामना उसमे सर्वाधिक होती है. वह शादी का बंधन तभी स्वीकार करती है जब वह अपनी अजादी से परेशान हो जाता है. यह सच है की आजादी मे सुकून होता है लेकिन अगर इसमे नाम्मात्र का भी दखल ना हो तो वक्त के साथ इसकी वकत ही पता नही चलती.और इसकी जरूरत ही खत्म हो जाती है. मेरा मानना है -अत्यधिक स्वतंत्रता अस्थिरता को जन्म देती है.और इसिलिये पुरुष अपनी अस्थिरता को कम करने एवंम स्थिरता की तलाश ,मे शादी को स्वीकार करता है.शायद यही वजह रही है कि समाज मे विवाहित पुरुष अधिक जिम्मेदार समझे जाते है क्योकि वे कही ना कही इस सच को स्वीकार कर चुके होते हैं. इसके अलावा भी कई वजहें हो सकती है मसलन -समाज द्वारा शारीरिक संबंधों को मंजूरी मिलना,जीवन क व्यवस्थित होना,पारिवारिक खुशी मिलना,और आखिर किसी के लिये खुशी खुशी हर रोज आफ़िस में काम करने की वजह मिल जाना.
अब बात करे दूसरे पक्श की यानी स्त्री की। एक स्त्री के लिये समाज ने यकीनन कई तरह के आदर्श और नियमो की फ़ेहरिश्त बना रखी है। जो की बचपन से ही किसी ना किसी ताह उनके दिलो दिमाग मे भर दिये जाते हैं। सुन्दर राज्कुमार के साथ सफ़ेद घोडे मे बैथकर सात समंदर की यात्रा करने क लावा भी आज शादी का रिश्ता कै मायनो मे स्त्री के लिये महत्व्पुर्ण है। एक ऐसा रिश्ता जो रिश्तो के नाम बदल देता है,जो उस्का घर बदल देता है, उसकी पहचान बदल देता है। यकीनन वर से कही ज्यादा मायने रखता है शादी का बंधन एक वधू के लिये।स्त्री प्रक्रति कि सबसे धैर्य्वान क्रति है।और इसके धैर्य के परिक्शा ताउम्र ली जाती है ।समाज मे स्त्री को उसके चरित्र के आधार पर परखा जाता है।यही वजह है कि बचपन के दहलीज के पार निकलते ही किशोरी मन स्वयं के प्रति सतर्क हो जाता है।दूस्रो की नजरो से खुद को छुपाती नजरे जमाने भर कि तहजीबो क बोझ ढोते ढोते झुक कर रह जाती है।इन बंधनो से आजाद होने का माध्यम बनकर आता है शादी का रिश्ता।उसके लिये जीवनसाथी मात्र एक साथ एक छ्त के नीचे रहने वाला शख्स नही होता,वह उसक ’सब कुछ’ होता है।जिसके लिये वह अपना सर्वस्व न्यौछावर करती है। जिसकी खुशी मे वह अपनी खुशी तलाश करती है।
एक सवाल ऐसे मे मन मे बार बार उठता है कि जब एक स्त्री पुरष को अपना स्वीकार करती है तब उसके जहन मे कहां क्या चल रहा होता होगा?वह कैसे फ़ैसला करती है कि किसे उसे छूने का हक दिया जाये और क्यो ? सारी उम्र जिस कौमर्य को वह बचाकर रखती है उसे अपर्ण करने से एक पल पूर्व उसकए मन मे क्या चलता होगा ?कि यही है इस जीवन मे मेरा सब कुछ,इस जन्म जो भी सुख दुख उठाने है इसी के साथ। हर दीवाली हर होली हर चौथ इनही हाथो के साथ मनेगी। क्या कुछ ऐसा। पता नही लेकिन यकीनन यह एक ऐसी उलझन है जिसे कम से कम ना शादी से पहले ना शादी के बाद पुरुष को नही सुलझाना पड़्ता।समाज मे पुरुष स्त्री दोनो को अपने अपने अधिकार प्राप्त है।लेकिन वास्तविकता मे जिसकी लाठी उसकी भैस वली कहावत हर जगह लागू होती है।शादी भी इससे अलग नही है।स्त्री इस बात से भली भाति वाकिफ़ है शायद इसीलिये वह यह फ़ैसला बस एक बार हि करना पसंद करती है।और फ़िर सारी जिन्दगी अपने फ़ैसले पर अड़ी रहती है। काश कि इस रिश्ते क दूसरा पहलू पुरुष भी इतना निश्छल और शीलवान होता।तब शादी कभी भी समौझाता नही बनती ।और सही मायनो मे जन्म जन्मांतर का रिश्ता बन पाती.
शादी सिर्फ़ घर बसाने या पीढियो को आगे बढाने के लिये नही की जाती. नाही परिणय दो जिस्मो के लिये आवश्यक मिलन का संधिस्थल है. बल्की इन सब से कही आगे है.हमारे समाज की सबसे बडी संस्थाओ मे से एक विवाह की स्पस्ट परिभाषा से मै अपरिचित हू.हा जहा तक मैने समझा है वह यह है की पुरुष और स्त्री दोनो के लिये यह संबंध स्व्यं मे विशिष्ट है. इसे प्राक्र्तिक वजह कहे या पुरुष का सदियो से संचित किया हुआ दंभ ,वह किसी भी तरह के बंधन को अस्वीकार करता है.सवच्छंद जीवन जीने की कामना उसमे सर्वाधिक होती है. वह शादी का बंधन तभी स्वीकार करती है जब वह अपनी अजादी से परेशान हो जाता है. यह सच है की आजादी मे सुकून होता है लेकिन अगर इसमे नाम्मात्र का भी दखल ना हो तो वक्त के साथ इसकी वकत ही पता नही चलती.और इसकी जरूरत ही खत्म हो जाती है. मेरा मानना है -अत्यधिक स्वतंत्रता अस्थिरता को जन्म देती है.और इसिलिये पुरुष अपनी अस्थिरता को कम करने एवंम स्थिरता की तलाश ,मे शादी को स्वीकार करता है.शायद यही वजह रही है कि समाज मे विवाहित पुरुष अधिक जिम्मेदार समझे जाते है क्योकि वे कही ना कही इस सच को स्वीकार कर चुके होते हैं. इसके अलावा भी कई वजहें हो सकती है मसलन -समाज द्वारा शारीरिक संबंधों को मंजूरी मिलना,जीवन क व्यवस्थित होना,पारिवारिक खुशी मिलना,और आखिर किसी के लिये खुशी खुशी हर रोज आफ़िस में काम करने की वजह मिल जाना.
अब बात करे दूसरे पक्श की यानी स्त्री की। एक स्त्री के लिये समाज ने यकीनन कई तरह के आदर्श और नियमो की फ़ेहरिश्त बना रखी है। जो की बचपन से ही किसी ना किसी ताह उनके दिलो दिमाग मे भर दिये जाते हैं। सुन्दर राज्कुमार के साथ सफ़ेद घोडे मे बैथकर सात समंदर की यात्रा करने क लावा भी आज शादी का रिश्ता कै मायनो मे स्त्री के लिये महत्व्पुर्ण है। एक ऐसा रिश्ता जो रिश्तो के नाम बदल देता है,जो उस्का घर बदल देता है, उसकी पहचान बदल देता है। यकीनन वर से कही ज्यादा मायने रखता है शादी का बंधन एक वधू के लिये।स्त्री प्रक्रति कि सबसे धैर्य्वान क्रति है।और इसके धैर्य के परिक्शा ताउम्र ली जाती है ।समाज मे स्त्री को उसके चरित्र के आधार पर परखा जाता है।यही वजह है कि बचपन के दहलीज के पार निकलते ही किशोरी मन स्वयं के प्रति सतर्क हो जाता है।दूस्रो की नजरो से खुद को छुपाती नजरे जमाने भर कि तहजीबो क बोझ ढोते ढोते झुक कर रह जाती है।इन बंधनो से आजाद होने का माध्यम बनकर आता है शादी का रिश्ता।उसके लिये जीवनसाथी मात्र एक साथ एक छ्त के नीचे रहने वाला शख्स नही होता,वह उसक ’सब कुछ’ होता है।जिसके लिये वह अपना सर्वस्व न्यौछावर करती है। जिसकी खुशी मे वह अपनी खुशी तलाश करती है।
एक सवाल ऐसे मे मन मे बार बार उठता है कि जब एक स्त्री पुरष को अपना स्वीकार करती है तब उसके जहन मे कहां क्या चल रहा होता होगा?वह कैसे फ़ैसला करती है कि किसे उसे छूने का हक दिया जाये और क्यो ? सारी उम्र जिस कौमर्य को वह बचाकर रखती है उसे अपर्ण करने से एक पल पूर्व उसकए मन मे क्या चलता होगा ?कि यही है इस जीवन मे मेरा सब कुछ,इस जन्म जो भी सुख दुख उठाने है इसी के साथ। हर दीवाली हर होली हर चौथ इनही हाथो के साथ मनेगी। क्या कुछ ऐसा। पता नही लेकिन यकीनन यह एक ऐसी उलझन है जिसे कम से कम ना शादी से पहले ना शादी के बाद पुरुष को नही सुलझाना पड़्ता।समाज मे पुरुष स्त्री दोनो को अपने अपने अधिकार प्राप्त है।लेकिन वास्तविकता मे जिसकी लाठी उसकी भैस वली कहावत हर जगह लागू होती है।शादी भी इससे अलग नही है।स्त्री इस बात से भली भाति वाकिफ़ है शायद इसीलिये वह यह फ़ैसला बस एक बार हि करना पसंद करती है।और फ़िर सारी जिन्दगी अपने फ़ैसले पर अड़ी रहती है। काश कि इस रिश्ते क दूसरा पहलू पुरुष भी इतना निश्छल और शीलवान होता।तब शादी कभी भी समौझाता नही बनती ।और सही मायनो मे जन्म जन्मांतर का रिश्ता बन पाती.
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